देवर्षि देवल धाम

देवर्षि देवल धाम

देवर्षि देवल धाम उत्तर प्रदेश में मऊ जिले के मुहम्मदाबाद गोहना तहसील  के देवकली देवलास नामक गाँव में स्थित है । यह पवित्र स्थल मऊ जनपद के प्रमुख  धार्मिक स्थलों से एक है। यह  मुहम्मदाबाद गोहना-घोसी मार्ग पर मुहम्मदाबाद से कि॰मी॰ की दूरी पर स्थित है ।  मुख्यालय मऊ से इसकी दूरी लगभग ३० किमी है | इस स्थान पर देवल ऋषि ने भगवान सूर्य की तपस्या  की थी और  भगवान भास्कर ऋषि देवल की तपस्या से प्रसन्न होकर अपने बाल रूप में प्रकट हुए तथा  देवर्षि देवल को दर्शन दिया।  इसकी वजह से यह स्थल देवल ऋषि के नाम पर प्रसिद्ध हुआ।  यह छोटा सा स्थान अपने अंदर अनेक विशेषताओं को समेटे हुए है। पूर्वजों  के अनुसार किसी समय तमसा नदी इस स्थान के निकट से होकर गुजरती थी । अब वही तमसा नदी मुहम्मदाबाद गोहना के पास से होकर गुजरती है। पुराणों एवं वेदों में  इसका प्रमाण मिलता है कि कल्पभेद के अनुसार नदियों के रास्तों में भी समय के साथ  परिवर्तन हो जाता    है । इस धाम के दक्षिणी तरफ देव ताल है जहाँ  रक्त कमल और उत्तरी तरफ तुलसी ताल है जहाँ  नील कमल के खिलने का प्रमाण प्राप्त होता है। 

प्राचीन अयोध्‍या साम्राज्‍य और गुप्‍त काल से जुड़ा है इस देवर्षि देवल धाम का संबंध : ऐसी भी मान्‍यता है कि प्राचीन काल में देवलास/देवलार्क अयोध्‍या साम्राज्‍य का पूर्वी द्वार था । आज़मगढ़ के गजेटियर के पृष्‍ट संख्या 156 पर लिखा है ….in Deolas of pargana Muhammadabad is a tank with rising ground near it, which is said to have formed the eastern gate of Ajodhya, that city, according to the legend, having had four gates all 42 kos distant from itself.

बालार्क सूर्य मंदिर और छठ मेला इस धाम की मुख्य मुख्‍य पहचान है | इस धाम पर प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में डाला छठ  के अवसर पर लगने वाला मेला, जो देवलास मेला के नाम से प्रसिद्ध है, इस स्‍थान की सबसे  प्रमुख पहचान है । सर्व विदित है कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को न केवल भारतवर्ष बल्कि विदेश  में भी सूर्य उपासना का महापर्व छठ अत्‍यंत धूम-धाम से मनाया जाता है । उसी अनुसार “देवर्षि देवल धाम” के नाम से विख्यात देवकली देवलास स्थित इस सूर्य मंदिर पर भी सूर्योपासना का यह महापर्व अत्‍यंत आदर, श्रद्धा और उत्‍साह के साथ मनाया जाता है और इस अवसर पर यहॉं एक विशाल मेला भी लगता है ।  यह मेला मऊ जनपद में लगने वाले सभी मेलों में सबसे बड़ा मेला है जिसकी देख-रेख व व्यवस्था जिला पंचायत विभाग द्वारा किया जाता है। मेले में आस-पास के जिलों के अलावा प्रदेश के अन्‍य सुदूर जिलों से भी दुकानें लगाने वाले आते हैं । मेले में  मिठाई की दुकानें , लकड़ी से निर्मित सामान  की दुकानें, दिल्ली से आयी श्रृंगार के सामानों  की दुकानें , कम्बल, रसोईघर के सभी सामान, धार्मिक व साहित्यिक किताबों की दुकानें इत्यादि बहुतायत मात्रा में देखी जा सकती हैं। इस मेले की सबसे मशहूर मिठाई खजला (खाजा) है।  मेले में झूले, सर्कस व थियेटर आदि तो आते ही हैं साथ ही  विभिन्‍न सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों के भी आयोजन किए जाते हैं ।

बहुत प्राचीन और पौराणिक हैं यह धार्मिक स्थल और मेला:  छठ के दिन से प्रारम्‍भ होकर लगभग एक सप्‍ताह तक चलने वाला यह मेला कितना प्राचीन है इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण तो ज्ञात नहीं है परन्‍तु ऐसा माना जाता है कि इस मेले की शुरूआत कई सौ साल पहले हुई होगी । अंग्रेज आई. सी. एस. अधिकारी डी. एल. ड्रेक – ब्रोकमैन द्वारा संपादित संकलित तथा सन 1911 में प्रकाशित आज़मगढ़ के गजेटियर में भी इस मेले का उल्‍लेख मिलता है गजेटियर के पृष्‍ट 65 पर लिखा है “The only other fair which deserves mention is the Deolas fair in pargana Muhhamadabad, which is also known as the Lalri Chhath and is held on the sixth of the light half of Kartik. Deolas is famous in the district for its lake and temple of sun ; and at the fair, to which considerable numbers resort from the neighbouring parganas, a thriving business is done by the shopkeepers.” स्पष्‍ट है कि देवकली देवलास स्थित बालार्क सूर्य मंदिर और छठ पर लगने वाला मेला अत्‍यंत प्राचीन हैं । यह बालार्क सूर्य मंदिर उड़ीसा के कोणार्क, काशी के लोलार्क और देश में विद्यमान कुछ अन्‍य गिने-चुने सूर्य मंदिरों में से एक है (जिसका प्रमाण इसी वेबसाइट के धाम विवरण पेज के सूर्य मंदिर नामक category  में दिया गया है )  । इस मंदिर में भगवान सूर्य के बाल स्वरूप बालार्क के दर्शन होते हैं ।

श्री विजयेन्द्र कुमार माथुर अपनी पुस्‍तक ऐतिहासिक स्थानावली में लिखते हैं कि “देवलास का प्राचीन नाम देवलार्क हुआ करता था, जिसका अर्थ 'सूर्य मन्दिर' है”।

सूर्य मंदिर, मेला और ऊपर बताई गई अन्‍य तमाम विशेषताओं  के अलावा इस धार्मिक स्थल  की एक और विशेषता भी है जो इस स्‍थान को और महत्‍वपूर्ण एवं विशेष बनाती है । इस स्थान पर सूर्य मंदिर के अलावा विभिन्‍न जातियों के मंदिर भी विद्यमान हैं । ये मंदिर जातीय संगम का अनूठा  उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।  इन मंदिरों में से कुछ प्राचीन हैं तो कुछ पिछले कुछ दशकों में निर्मित हुए हैं । सूर्य मंदिर के ठीक बगल में ही राजभर जाति समाज का मंदिर है तो उसके ठीक सामने हरिजन जाति समाज  का मंदिर भी विद्यमान है और सूर्य मंदिर के पीछे हनुमान मंदिर है । यहॉं चौहान, गोंड़, यादव, कुम्‍हार, धोबी, बनिया, लोहार आदि जातियों के मंदिर भी विद्यमान हैं । इन मंदिरों में संबंधित जातियों के अपने आराध्‍य हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तिेयां स्‍थापित हैं । राजभर जाति के मंदिर में भगवान शिव की प्रतिमा स्‍थापित है । 1923 में निर्मित गोंड़ जाति के मंदिर में भगवान शिव और गोंड़ जाति के आराध्‍य देव नाथू एवं कालू की प्रतिमाएं स्‍थापित हैं । इसी प्रकार हरिजन जाति द्वारा बनवाए गए मंदिर में संत रविदास, लोहार समाज के मंदिर में भगवान विश्‍वकर्मा, धोबी समाज के मंदिर में उनकी जाति के प्रेरणाश्रोत रहे संत गोडसे पारखी, यादव समाज के मंदिर में राधा-कृष्‍ण तो वैश्य समाज के मंदिर में उनके समाज के संत गणिनाथ महाराज की मूर्ति स्‍थापित की गई है । क्षत्रिय समाज ने यहॉं पर महाराणा प्रताप का स्‍मारक बनाया हुआ है । सूर्य मंदिर में पूजा-पाठ शाकद्वीपिय ब्राह्मणों द्वारा किया जाता है वहीं विभिन्‍न जाति के मंदिरों की देख-रेख और उनमें पूजा-पाठ संबंधित जाति के पुजारियों द्वारा की जाती है । यहॉं कबीरपंथी संतों का एक मठ व मंदिर भी मौजूद है । अनेकता में एकता और जातीय संगम का अनोखा उदाहरण प्रस्‍तुत करते ये मंदिर-मठ इसलिए भी महत्‍वपूर्ण हैं कि ये लोगों को बॉंटते नहीं बल्कि जोड़ते हैं । किसी भी मंदिर में किसी के भी आने-जाने पर कोई रोक नहीं और न ही इनको लेकर कोई मनमुटाव, टकराव, द्वेष या वैर भाव । श्रद्धालु हर मंदिर में उसी श्रद्धा और भक्ति के साथ शीश नवाते हुए देखे जाते हैं । संभवत: देवलास दुनिया का एकमात्र ऐसा स्‍थान होगा जहां विभिन्‍न जातियों के मंदिर एक ही परिसर में मौजूद हों ।

इस स्‍थल के प्रति स्‍थानीय लोगों की श्रद्धा और इसकी पावनता इस बात से भी दृष्टिगोचर  होती है कि धार्मिक स्थल के चारों तरफ किमी कि दूरी पर  मांस-मछली-अंडा -मदिरा की एक भी दूकान मौजूद नहीं है

इस धार्मिक स्थल पर दो समितियां कार्य करती हैं  |

१ . सूर्य मंदिर प्रबंध समिति, देवकली देवलास - मऊ 

इस समिति को देवकली देवलास गाँव के शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के द्वारा संचालित किया जाता है।  इस समिति के वर्तमान संरक्षक- श्री विजय शंकर पाण्डेय , अध्यक्ष - शिवशंकर पाण्डेय एवं  महामंत्री - बदरीनाथ पाण्डेय हैं ।  यह समिति यहाँ पर होने वाले विकास कार्यों की योजना बनाने, कार्य को सम्पन्न करवाने आदि का काम देखने के साथ-साथ  सूर्य मंदिर में  पूजा-पाठ,साफ़-सफाई तथा छठ एवं मेले के दौरान मंदिर पर होने वाले सभी संबंधित आयोजनों की देख-रेख करती है। 

०२. देवर्षि देवल जनकल्याण समिति,देवलास -मऊ 

इस समिति को क्षेत्रीय जनता के द्वारा संचालित किया जाता है।  इस समिति के वर्तमान संरक्षक - पं० श्याम सुंदर पाण्डेय, अध्यक्ष - डॉ० राम मूरत यादव, महामंत्री – उधम प्रताप सिंह, कोषाध्यक्ष - जनार्दन यादव व अन्य सदस्यगण हैं ।  इस समिति के द्वारा यहाँ के क्षेत्रीय जनता के  सहयोग से  विगत १० वर्षों से इस धार्मिक स्थल पर अत्यंत भव्य  नौ  दिवसीय  श्री  राम कथा सम्मेलन  का आयोजन किया जाता है। इस सम्मेलन में  अयोध्या व काशी जैसे  धार्मिक जगहों से आये विद्वान संतों  के मुखारविंद से कथा सुनाई जाती है। यह नौ दिवसीय श्री राम कथा प्रत्येक वर्ष २३ दिसंबर से आरम्भ होकर ३१ दिसंबर तक चलती है।  

सोशल मीडिया के माध्यम से इस पौराणिक स्थल के प्रचार-प्रसार के लिए क्षेत्रीय युवाओं के सहयोग से “देवकली देवलास: एक अद्भुत धार्मिक स्थल” नाम से एक फ़ेसबुक पेज का संचालन भी किया जाता है । इस पेज पर ऑनलाइन माध्यम से विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक लाइव कार्यक्रम आयोजित करके  इस स्थल के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का मार्गदर्शन भी किया जाता है। पेज से जुड़े  यूट्यूब चैनल DDE Deval Dham Entertainment पर इस पौराणिक-धार्मिक स्थल से संबंधित गीत व अन्य वीडियो उपलब्ध हैं।   (इस फ़ेसबुक पेज व यूट्यूब चैनल का लिंक इस वेबसाइट पर उपलब्ध है।  )

इस स्थल की तमाम विशेषताओं की दृष्टि से यहॉं पर्यटन की अपार संभावनाओं को देखते हुए इस स्‍थान को एक पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किये जाने की आवश्यकता है जिससे इस स्थान की लोकप्रियता तो बढ़ेगी ही साथ ही इससे यहाँ के लोगों के लिए रोजगार की नई संभावनाएं भी पैदा होंगी, लेकिन अब तक शासन स्तर से इस दिशा में गंभीरता से कोई ठोस प्रयास नहीं किये गए हैं  जबकि कोणार्क सूर्य मंदिर व अन्य कई सूर्य मंदिरो को  शासन के सहयोग से पर्यटक स्थल  के रूप में विकसित किया गया है । कोणार्क सूर्य मंदिर में मेला की प्राचीनता बनाये रखने हेतु शासन के द्वारा धन मुहैया कराया जाता है जिससे यह  स्थान  बेहतरीन ढंग से प्रबंधित है। यही कारण है कि  कोणार्क सूर्य मंदिर की भव्यता के  दर्शन के लिए न केवल हिन्दुस्तान के कोने-कोने से बल्कि विदेशो  से भी लोग आते हैं।  अत्यंत दुखद है कि बालार्क सूर्य मंदिर शासन द्वारा अनदेखी का शिकार रहा है। इस मंदिर व मेले को  स्थानीय जनता के भरोसे छोड़ दिया गया है।  स्थानीय जनता ने आज तक अपनी क्षमता अनुसार इस स्थान के विकास और बेहतरी के लिए भरपूर योगदान किया है। इसी वजह से प्राचीन बालार्क सूर्य मंदिर की  सुंदरता एवं भव्यता बची हुई है और मेले का स्वरूप भी  बरकरार है । ग्राम सभा व जिला पंचायत की ओर से कुछ  विकास का कार्य  जरूर किया गया है पर उसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग की ओर से लगभग 50 लाख रुपए बालार्क सूर्य मंदिर के विकास के लिए स्वीकृत होने की  खबर मिली है और आधारशिला रखे जाने  संबंधी शिलापट्ट भी लगवाया जा चुका है पर अभी तक कार्य प्रारंभ नहीं हो पाया है। आशा की जाती है विकास संबंधी यह कार्य शीघ्र प्रारंभ हो जाए। 

                                                                                                                                          आभार-     देवकांत पांडेय
                                                                                                                                                      पं० श्यामसुंदर पांडेय

       आगे यदि और अधिक जानकारी प्राप्त होती है तो इस लेख  में अद्यतन होता रहेगा।